Monday, May 17, 2010
क्षेत्रीय एवं द्विपक्षिये/ बहुपक्षिये समझौते (Reginal/ Biletral/ Multilateral Agreements)
क्षेत्रीय एवं द्विपक्षिये/ बहुपक्षिये समझौते (Reginal/ Biletral/ Multilateral Agreements): राष्ट्र हित हेतु नीतियाँ/ प्रतिबंधन नीतियाँ बनता, अंतरराष्ट्रीय नीतियां, आजकल में एक्पक्षिये/द्विपक्षिये है पाहिले द्विपक्षिए, द्विपक्षिये अधिक लाभकारी क्योकी -क्योकी समझौते अल्पकालिक/ शंशोधन संभव जबकि बहुपक्षिये में सकत नियम, कोटा प्रणाली, 1. द्विपक्षिए व्यापार समझौते- आपसी विचार, दोनों क़ा लाभ संभव, भुगतान संतुलन, आसान compromise, मात्र/ माल उचित निर्धारण, मुद्रा समस्या कम, 2.द्विपक्षिए व्यापार के रूप- तीन प्रकार होते: (i).निजी क्षतिपूर्ति-क्षतिपूर्ति अग्रीमेंट/ बीमा आदि से बचाव (ii).समाशोधन समझौते: आयात क़ा भुगतान अपना देश केंद्रीय बैंक करता, बैंकों द्वारा लेन देन नियंत्रित, लिसेंस जरुरी नहीं, दीर्धकालिक समझौते (iii).भुगतान समझौते-समाशोधन से अधिक प्रभ्व्शाली, विनमय नियंत्रण, भुगतान संतुलन, surplus तैयार करना, जमापूंजी से ऋण अदा, बहु उदेशेये प्रणाली होती, 3.द्विपक्षिए व्य्हपार साम्झौतों की विशेषताएं: (i)1-5 वर्ष अवधि शंशोधन संभव (ii)एक दुसरे को अधिकतम व्यापर सुविधाएँ/ मुनाफा (iii)द्व० विश्व यु० के बाद से केवल दो देशों के बिच (iv)दोनों फर्म/ देश आयत निर्यात प्रबंधन करते (v)भुगतान देश केंद्रीय बैंक द्वारा- कानून मन्ये (vi)कम परेशानी वाले कानून, असुरक्षा दोनों के लिए खतरा 4.द्वापक्षिये व्यापर समझौतों के उदेशेये- (i)विनमय दर स्थिरीकरण- स्थिर दर= अर्थव्यस्था वृद्धि (ii)औद्योगिक उन्नति- बहुआयामी लाभ (iii)विदेशी व्यापर वृद्धि- सम्बन्ध विस्तार/ लम्बे और स्वस्थ सम्बन्ध (iv)एकाधिकार क़ा लाभदायक उपयोग-अधिकारों क़ा बटवारा, माल संकेन्द्रण से लाभ (v)विदेशी विनमय क़ा मित्व्ययातापूर्ण(economical) प्रयोग:दुर्लभ मुद्रा वाले देश से कठिनाई, अपने पास विनमय शक्ति अची होनी चाहिए (vi)संरक्षण की आवश्यकता- ताकि प्रतिस्पर्धा बावजूद अधिक से अधिक निर्यात (vii)आवश्यक उपभोगता वस्तुओं की prapti (viii)विदेशी पुनती दुरूपयोग पर प्रतिबन्ध 5.द्विपक्षिए (क्षेत्रीय) समझौतों क़ा मूल्यांकन: लाभ: 1.भुगतान संतुलन २.हानिकारक आयात पर रोक, ३.तीव्र गति से लाभ, ४.भुगतान कठिनयन कम ५.स्वंत्र पूंजी प्रवाह ६.प्रथ्स्पर्धा कम होती हनी/आलोचनाएँ: 1.विकाशशील देशों क़ा विश्व व्यापर में कम योगदान-द्विपक्षियेता में बहुपक्षिये देशों को हानि २.शोषण की प्रवृत्ति-विकसित देश विकासशील क़ा शोषण करते, दबाव रहेता, ३.द्विपक्शिअत क़ा आदि होना- लत लग्न 6.भारत क़ा द्विपक्षिए व्यापर समझौते: लाभ हो रहा, विद्वान मानते की अभी उपयोगी नहीं, शोषण भी होता, भारत को लाभ: बहुपक्षियेता और द्विपक्षियता विधमान इसीलिए लाभ;; बहुपक्षिये व्यापार समझौते: कई देशों के साथ होते, द्वितीये विश्व युद्ध के बाद से अस्तित्व, विक्षत/विकासशील देशों को लाभ मिला, श्रम विभाजन से लाभ, अल्पविकसित देशों के शोषण में कमी, लाभ: 1.कई देश शामिल इसीलिए मनमानी असंभव, २. दीर्ध(लम्बी) अवधि के होते hence लाभ ३.गुणवत्ता युक्त उपभोगता और तकनीशियन ४.एकाधिकार हनन असंभव ५.शोषण नहीं होता ६.सभी देशों आर्थिक उन्नति ७.सभीका सामान मुलांकन= समानता, भेद्भाव्हीनता, ८.एक ही मुद्रा/मुद्राओं क़ा सामान विनमय, ९.व्यापक रियतें १०.विश्व बाज़ार विकास उन्नत ११. दोषरहित विनमय १२, भेदभाव हीनता; बहुपक्षिये संस्थाएं: International Labour Organization (ILO), Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO), United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO), (WHO), International Bank for Reconstruction and Development (IBRD)- मुद्रा कोष, पुनर्निर्माण/ विकास बैंक, International Monetary Fund (IMF)- मुद्रा कोष, पुनर्निर्माण/ विकास बैंक , International Civil Aviation Organization (ICAO), Universal Postal Union (UPU), International Telecommunication Union (ITU), World Meteorological Organization (WMO), International Maritime Organization (IMO), International Fund for Agricultural Development (IFAD), United Nations Industrial Development Organization (UNIDO), International Atomic Energy Agency (IAEA), (WTO),;;
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment